मानव का रास्ता

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Kavita to jo apka jina sika degi

रास्ते अक्सर देर से मिलते हैं,

यह उनका स्वभाव है।

उन्हें कभी भी अकेले ना रहने देना ,

मानव का धर्म है।

सूर्योदय रोज होता है,

यह जीवन का सत्य है,

अपनी भितर की बुराई भुलाकर ,

नया दिपक जलाना , मानव कर्म है।

हरी भरी संसार , अवर्णीय दृश्य,

यह जीवन का सुंदर सार है।

पर भ्रष्ट मनुष्य,पैसों के मोहक,

पर्यावरण इनके लिए भार है।

इक इक मिट्टी का दाना बनाना,

पयंभर का श्रम था।

दुनिया में नाम बनाना ,

यह मानव तेरा श्रम है।

है मानव,

कर्म कर भगवान की तरह,

मेहनत कर शेतान की तरह।

तप कर ऋिषि की तरह

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